40 साल बाद खुला करोड़ों की प्लॉट घोटाले का राज, हिलटॉप सोसायटी के पदाधिकारियों पर ईओडब्ल्यू का शिकंजा
भोपाल. घर बनाने का सपना दिखाकर सैकड़ों लोगों से करोड़ों रुपये जुटाने और चार दशक बीत जाने के बाद भी उन्हें उनके भूखंडों का कब्जा नहीं देने के बहुचर्चित मामले में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) ने बड़ी कार्रवाई की है. भोपाल की हिलटॉप गृह निर्माण सहकारी संस्था के पदाधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र का प्रकरण दर्ज किया गया है. जांच में सामने आए तथ्यों ने न केवल सहकारी संस्था के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों की पीड़ा को भी उजागर किया है, जो करीब 40 वर्षों से अपने ही प्लॉट के लिए भटक रहे हैं.
ईओडब्ल्यू की कार्रवाई शिकायतकर्ता नरेंद्र नाथानी सहित अनेक सदस्यों की शिकायतों और विस्तृत जांच के बाद हुई है. जांच में प्रथम दृष्टया पाया गया कि संस्था के पदाधिकारियों ने सदस्यों से भूखंडों की पूरी कीमत वसूलने के साथ-साथ विकास शुल्क के नाम पर भी बड़ी रकम ली, लेकिन इसके बावजूद वर्षों तक उन्हें उनके भूखंडों का कब्जा नहीं दिया गया. इतना ही नहीं, सदस्यों को मूल विक्रय पत्र देने के बजाय केवल फोटोकॉपी उपलब्ध कराई गई और असली दस्तावेज संस्था के पास ही रखे गए.
जांच के आधार पर तत्कालीन अध्यक्ष सत्येन्द्र अग्रवाल, वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती अनीता सिंह तथा अन्य जिम्मेदार पदाधिकारियों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-बी के तहत अपराध दर्ज किया गया है. मामले की विवेचना जारी है और आगे और भी महत्वपूर्ण खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है.
जांच रिपोर्ट के अनुसार हिलटॉप गृह निर्माण सहकारी संस्था का गठन वर्ष 1986 में किया गया था. संस्था का पंजीयन 11 दिसंबर 1986 को हुआ था. उस समय राजस्व विभाग में पदस्थ अधिकारियों ने मिलकर संस्था का गठन किया था, जिनमें तत्कालीन तहसीलदार सत्येन्द्र अग्रवाल भी शामिल थे. संस्था ने शुरुआत में लगभग 200 से 250 लोगों को सदस्य बनाया और उनसे भूखंड उपलब्ध कराने के नाम पर करीब तीन से चार करोड़ रुपये एकत्र किए. इस राशि से कोटरा सुल्तानाबाद, बरखेड़ी खुर्द, बावड़िया कलां और प्रेमपुरा क्षेत्रों में भूमि खरीदी गई ताकि वहां कॉलोनियां विकसित कर सदस्यों को प्लॉट आवंटित किए जा सकें.
ईओडब्ल्यू की जांच में सामने आया कि संस्था ने अनेक सदस्यों के नाम रजिस्ट्री तो कर दी, लेकिन लगभग 40 वर्ष गुजर जाने के बाद भी उन्हें वास्तविक कब्जा नहीं मिला. हर बार उन्हें यह कहकर टाल दिया गया कि संबंधित भूमि न्यायालयीन विवाद में फंसी हुई है. इस बीच सदस्य लगातार विकास शुल्क और अन्य मदों में धनराशि जमा करते रहे.
जांच में यह भी पाया गया कि संस्था ने सदस्यों को मूल दस्तावेज न देकर केवल फोटोकॉपी दी. इसी व्यवस्था का लाभ उठाकर बाद के वर्षों में रिकॉर्ड में कथित हेरफेर किया गया. ऑडिट रिपोर्ट और दस्तावेजों के परीक्षण में यह तथ्य सामने आया कि कई भूखंडों के आवंटन रिकॉर्ड और वास्तविक रजिस्ट्री दस्तावेजों में अंतर पाया गया.
ईओडब्ल्यू को जांच के दौरान यह भी पता चला कि संस्था ने लगभग 25 एकड़ भूमि करीब 23 लाख रुपये में खरीदी थी और अतिरिक्त 30 एकड़ भूमि के लिए लगभग 12 लाख रुपये अग्रिम रूप से चुकाए थे. इतनी बड़ी भूमि उपलब्ध होने के बावजूद बड़ी संख्या में सदस्यों को प्लॉट नहीं दिए गए. कई मामलों में भूखंडों की रजिस्ट्री होने के बाद भी कब्जा नहीं दिया गया और बाद में उन्हीं भूखंडों को दूसरे लोगों के नाम दर्ज कर दिया गया.
जांच में सामने आया कि जिस भूमि पर कई सदस्यों के नाम प्लॉट दर्ज किए गए थे, उसका एक हिस्सा वर्ष 2003 में मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल द्वारा अधिग्रहित किया जा चुका था. इसके बावजूद उसी भूमि के नाम पर लोगों से धनराशि वसूली जाती रही. यह तथ्य भी जांच एजेंसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है.
एक मामले में सदस्यता क्रमांक 763 वाले सदस्य के नाम वर्ष 1993 में भूखंड क्रमांक 177 की रजिस्ट्री की गई थी, लेकिन बाद की आवंटन सूची में वही भूखंड क्रमांक 178 दर्शा दिया गया और मूल भूखंड किसी अन्य व्यक्ति के नाम कर दिया गया. इसी तरह सदस्यता क्रमांक 509 वाले सदस्य के नाम दर्ज भूखंड को भी बाद में किसी अन्य व्यक्ति के नाम दर्शाने के आरोप सामने आए हैं.
ईओडब्ल्यू की जांच में यह भी पाया गया कि कई सदस्यों से वास्तविक कीमत से कई गुना अधिक राशि विकास कार्यों के नाम पर ली गई, लेकिन उसके अनुरूप कार्य नहीं हुए. कई वरिष्ठ नागरिक और सेवानिवृत्त शासकीय कर्मचारी भी कथित धोखाधड़ी के शिकार पाए गए हैं. वर्षों तक उन्हें केवल आश्वासन दिया जाता रहा और कब्जा नहीं मिला.
सहकारिता विभाग की वर्ष 2023-24 की ऑडिट रिपोर्ट में भी सदस्यता सूची, आवंटन सूची और पंजीयन अभिलेखों के बीच गंभीर विसंगतियां दर्ज की गई थीं. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि लेआउट अनुमोदन से पहले ही बड़ी संख्या में सदस्यों के नाम पंजीयन किए गए थे.
ईओडब्ल्यू का मानना है कि उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों, सदस्यों के बयानों और रिकॉर्ड में मिले अंतर से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि भूखंड आवंटन और रिकॉर्ड प्रबंधन में सुनियोजित तरीके से अनियमितताएं की गईं. इसी आधार पर संस्था के जिम्मेदार पदाधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया है.
करीब चार दशक तक अपने सपनों के घर का इंतजार कर रहे सैकड़ों परिवार अब जांच और न्यायिक प्रक्रिया से उम्मीद लगाए बैठे हैं. ईओडब्ल्यू की इस कार्रवाई को प्रदेश के सबसे लंबे समय से लंबित सहकारी आवासीय विवादों में एक बड़ी कानूनी पहल माना जा रहा है. अब जांच एजेंसी पूरे मामले की वित्तीय और प्रशासनिक परतों को खंगाल रही है, जिससे आने वाले दिनों में और भी बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं.
