पीओके में उबाल से बेनकाब हुई पाकिस्तान की कश्मीर नीति और दमन के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग
नई दिल्ली. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में बढ़ते जनाक्रोश और हालिया घटनाक्रमों ने एक बार फिर पाकिस्तान की कश्मीर नीति को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है. जिस क्षेत्र को लेकर पाकिस्तान दशकों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज उठाता रहा है, वहीं अब स्थानीय लोगों द्वारा राजनीतिक अधिकारों, आर्थिक न्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं. हालात इस कदर बिगड़ गए हैं कि क्षेत्र में सुरक्षा बलों की कार्रवाई, गिरफ्तारियों और संचार प्रतिबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई जाने लगी है.
हाल के दिनों में पीओके में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई मौतों और कथित दमनात्मक कार्रवाइयों ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है. विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उनकी मांगों को सुनने के बजाय प्रशासन ने सख्ती का रास्ता अपनाया. हालांकि मृतकों की वास्तविक संख्या को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन स्थानीय संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का दावा है कि हालात गंभीर हैं और क्षेत्र में असंतोष लगातार बढ़ रहा है.
इस पूरे विवाद के केंद्र में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) है, जो नागरिक समाज, व्यापारियों, छात्रों, वकीलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों का एक साझा मंच माना जाता है. शुरुआत में यह संगठन बढ़ती महंगाई, बिजली दरों और प्रशासनिक विफलताओं जैसे मुद्दों को लेकर सक्रिय हुआ था, लेकिन समय के साथ यह पीओके के लोगों की व्यापक राजनीतिक और आर्थिक मांगों का प्रमुख मंच बन गया. हाल ही में पाकिस्तान सरकार द्वारा इस संगठन पर आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंध लगाए जाने के बाद विरोध और तेज हो गया.
जेएएसी ने पीओके विधानसभा चुनावों में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों के मुद्दे पर मुजफ्फराबाद मार्च का आह्वान किया था. संगठन का आरोप था कि स्थानीय जनता की आवाज को कमजोर करने के लिए यह कदम उठाया गया है. इसके बाद प्रशासन की कार्रवाई और संगठन पर प्रतिबंध ने पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को सुरक्षा के मुद्दे में बदलकर दबाने की कोशिश की जा रही है.
पीओके में बढ़ते असंतोष का असर विदेशों में रहने वाले कश्मीरी समुदाय पर भी दिखाई देने लगा है. ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन आयोजित किए गए. लंदन स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग, ब्रैडफोर्ड और बर्मिंघम में पाकिस्तानी दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों के बाहर प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान सरकार पर दमनकारी रवैया अपनाने का आरोप लगाया. प्रदर्शनकारियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मामले में हस्तक्षेप और निष्पक्ष जांच की मांग की.
ब्रिटेन के कई सांसदों ने भी कथित तौर पर वहां की सरकार से पीओके की स्थिति पर ध्यान देने की अपील की है. रिपोर्टों के अनुसार संचार सेवाओं पर प्रतिबंध, इंटरनेट बंदी और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर चिंता व्यक्त की गई है. इससे यह संकेत मिलता है कि यह मुद्दा अब केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बनता जा रहा है.
सोशल मीडिया पर भी पीओके से जुड़े वीडियो और तस्वीरें तेजी से साझा की जा रही हैं. इनमें कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन, सुरक्षा बलों की तैनाती और लोगों के गुस्से को देखा जा सकता है. हालांकि इन वीडियो और तस्वीरों की स्वतंत्र पुष्टि हर मामले में संभव नहीं है, फिर भी इनसे यह स्पष्ट होता है कि क्षेत्र में हालात सामान्य नहीं हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि पीओके में उभर रहा यह असंतोष पाकिस्तान के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है. लंबे समय से पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रमुखता से उठाता रहा है, लेकिन अब उसके नियंत्रण वाले क्षेत्र में ही लोगों द्वारा अधिकारों और स्वतंत्रता की मांग किए जाने से उसकी स्थिति असहज हो सकती है. यही कारण है कि पीओके की घटनाओं को पाकिस्तान की आधिकारिक कश्मीर नीति की कसौटी के रूप में भी देखा जा रहा है.
इस बीच जम्मू-कश्मीर के कुछ नेताओं ने भी पीओके की स्थिति पर चिंता जताई है. कई नेताओं ने वहां के लोगों के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं. हालांकि इस मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक प्रतिक्रिया अभी सीमित रही है, लेकिन घटनाक्रम ने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींचा है.
विश्लेषकों का कहना है कि पीओके में बढ़ती नाराजगी केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है. इसके पीछे आर्थिक संकट, बेरोजगारी, महंगाई, बिजली दरों में वृद्धि और प्रशासनिक असंतोष जैसे कई कारण भी जुड़े हुए हैं. यही वजह है कि विरोध प्रदर्शनों में समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी देखने को मिल रही है.
फिलहाल पीओके में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है. प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की आशंका बनी हुई है, जबकि स्थानीय लोग अपने अधिकारों और मांगों को लेकर आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं. आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान सरकार इस असंतोष का समाधान संवाद के जरिए करती है या फिर सख्ती का रास्ता जारी रखती है. लेकिन इतना तय है कि पीओके में उभरा यह संकट अब केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह पाकिस्तान की कश्मीर नीति और उसके दावों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.
