भोपाल गैस त्रासदी कचरा निपटान के ट्रायल रन लगाई रोक
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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 27 को
भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल गैस त्रासदी के जहरीले कचरे के निपटान को लेकर 27 फरवरी को होने वाली सुनवाई तक ट्रायल रन पर रोक लगा दी है। यह फैसला तब आया जब याचिकाकर्ताओं ने कचरे के परिवहन और निपटान को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं।
स्ुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 27 फरवरी तक कोई भी ट्रायल रन नहीं होगा। राज्य सरकार को यह साबित करना होगा कि कचरे का निपटान स्थानीय लोगों के लिए खतरा नहीं बनेगा। अदालत ने कहा कि यदि सरकार पर्यावरणीय और स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पाती, तो मामले में हस्तक्षेप किया जाएगा। पीथमपुर, जो इंदौर से करीब 30 किलोमीटर दूर है, पहले से ही एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है। यहां के लोग इस फैसले से नाराज हैं क्योंकि उन्हें डर है कि जहरीले कचरे का निपटान यदि सही तरीके से नहीं हुआ, तो यह उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 फरवरी को होगी, जिसके बाद यह तय होगा कि कचरे के निपटान का ट्रायल रन होगा या नहीं। सरकार को इस दौरान यह साबित करना होगा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित है और इससे किसी भी तरह का पर्यावरणीय या स्वास्थ्य संबंधी खतरा नहीं होगा। यह मामला न सिर्फ पर्यावरणीय बल्कि जनस्वास्थ्य और न्याय से भी जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस पर अंतिम दिशा तय करेगा।
क्या है पूरा मामला?
भोपाल गैस त्रासदी के 40 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड के परिसर में जहरीला कचरा जमा है। इसे हटाने की प्रक्रिया के तहत, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 18 फरवरी को आदेश दिया था कि 10 मीट्रिक टन कचरे का ‘ट्रायल रन’ 27 फरवरी को पीथमपुर में किया जाए। इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसमें कहा गया कि पीथमपुर के स्थानीय लोग इस कदम के खिलाफ हैं क्योंकि यह क्षेत्र घनी आबादी वाला है और यहां पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं हैं।
भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल गैस त्रासदी के जहरीले कचरे के निपटान को लेकर 27 फरवरी को होने वाली सुनवाई तक ट्रायल रन पर रोक लगा दी है। यह फैसला तब आया जब याचिकाकर्ताओं ने कचरे के परिवहन और निपटान को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं।
स्ुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 27 फरवरी तक कोई भी ट्रायल रन नहीं होगा। राज्य सरकार को यह साबित करना होगा कि कचरे का निपटान स्थानीय लोगों के लिए खतरा नहीं बनेगा। अदालत ने कहा कि यदि सरकार पर्यावरणीय और स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पाती, तो मामले में हस्तक्षेप किया जाएगा। पीथमपुर, जो इंदौर से करीब 30 किलोमीटर दूर है, पहले से ही एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है। यहां के लोग इस फैसले से नाराज हैं क्योंकि उन्हें डर है कि जहरीले कचरे का निपटान यदि सही तरीके से नहीं हुआ, तो यह उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 फरवरी को होगी, जिसके बाद यह तय होगा कि कचरे के निपटान का ट्रायल रन होगा या नहीं। सरकार को इस दौरान यह साबित करना होगा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित है और इससे किसी भी तरह का पर्यावरणीय या स्वास्थ्य संबंधी खतरा नहीं होगा। यह मामला न सिर्फ पर्यावरणीय बल्कि जनस्वास्थ्य और न्याय से भी जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस पर अंतिम दिशा तय करेगा।
क्या है पूरा मामला?
भोपाल गैस त्रासदी के 40 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड के परिसर में जहरीला कचरा जमा है। इसे हटाने की प्रक्रिया के तहत, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 18 फरवरी को आदेश दिया था कि 10 मीट्रिक टन कचरे का ‘ट्रायल रन’ 27 फरवरी को पीथमपुर में किया जाए। इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिसमें कहा गया कि पीथमपुर के स्थानीय लोग इस कदम के खिलाफ हैं क्योंकि यह क्षेत्र घनी आबादी वाला है और यहां पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं हैं।
