जान जोखिम में डालकर स्कूल जाने को मजबूर नौनिहाल
मानव अधिकार आयोग ने मुख्य सचिव से मांगी रिपोर्ट
भोपाल। शिक्षा पाने की ललक जब जानलेवा रास्तों से होकर गुजरे, तो यह सिर्फ एक गांव की मजबूरी नहीं बल्कि हमारी व्यवस्था पर करारा प्रहार है। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के काकरौआ गांव से सामने आई एक खौफनाक तस्वीर ने राज्य के प्रशासनिक तंत्र और मानवाधिकार दावों की पोल खोलकर रख दी है। बेतवा नदी के स्टॉप डैम के खुले और फिसलन भरे खंभों को फांदकर रोज स्कूल जाने वाले बच्चों की लाचारी का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लिया है।
आयोग ने इस मामले को मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन मानते हुए मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। 13 किलोमीटर लंबे सड़क मार्ग के चक्कर से बचने के लिए गांव के नौ बच्चे जिनमें पांच छात्राएं भी शामिल हैं रोजाना 1.5 किलोमीटर का यह खतरनाक पुल पार करते हैं। एक छोटी बच्ची तो लंबाई कम होने के कारण इन खंभों को पार नहीं कर सकी, जिससे उसकी पढ़ाई छूटी और वह परीक्षा में फेल हो गई।
आयोग ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21। और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देते हैं। आयोग ने अविनाश मेहरोत्रा बनाम भारत संघ (2009) मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि सुरक्षित बुनियादी ढांचा और सुरक्षित परिवहन भी शिक्षा के अधिकार का ही हिस्सा है। तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने दौरा जरूर किया, लेकिन पुल या सुरक्षित मार्ग निर्माण की कोई तय समयसीमा अब तक नहीं बताई गई है। मजबूरी और बदहाली के बीच झूलते इन बच्चों के भविष्य के लिए अब प्रशासन के ठोस कदम का इंतजार है।
