दतिया उपचुनाव में केवल सीट नहीं, साख की जंग
भाजपा के लिए खोई सीट पाने की चुनौती तो कांग्रेस के सामने जनाधार बचाने की परीक्षा
भोपाल। प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को होने जा रहा उपचुनाव महज़ एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि सूबे की राजनीति का भावी रुख तय करने वाला महामुकाबला बन चुका है। 2023 के आम चुनावों में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने तत्कालीन गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को लगभग 7,700 वोटों से हराकर राज्य का सबसे चर्चित उलटफेर किया था। अब भारती की अयोग्यता के बाद खाली हुई इस सीट पर होने जा रही वोटिंग दोनों प्रमुख दलों के लिए प्रतिष्ठा की अंतिम लड़ाई बन गई है।
30 जुलाई को होने वाले मतदान में क्षेत्र के लगभग 2.20 लाख मतदाता प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे, जिसकी मतगणना 3 अगस्त को होगी। दतिया के रण में इस बार मुख्य मुकाबला त्रिकोणीय नज़र आ रहा है। भाजपा ने 2023 की हार का हिसाब चुकता करने के लिए युवा चेहरे आशुतोष तिवारी पर दांव खेला है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने यहाँ धुआंधार प्रचार कर इसे साख की लड़ाई बना दिया है। वहीं कांग्रेस ने अनुभवी नेता घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा है। पार्टी इसे 2023 के अपने जनादेश पर जनता की मुहर के रूप में देख रही है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे सहित कई दिग्गजों ने उनके पक्ष में माहौल बनाया है। इसके अलावा सामाजिक न्याय और दलित-पिछड़े वर्ग के मुद्दों के साथ मैदान में उतरे दामोदर यादव भले ही तीसरे कोण के रूप में दिख रहे हों, लेकिन कई बूथों पर इनका प्रभाव हार-जीत के समीकरण बिगाड़ सकता है।
जातीय गणित और स्थानीय मुद्दों का ताना-बाना
दतिया में ब्राह्मण, अनुसूचित जाति, कुशवाह, यादव, वैश्य और ओबीसी वर्ग राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली माने जाते हैं। सटीक आधिकारिक आंकड़े न होने के बावजूद दोनों प्रमुख दलों ने बूथ-स्तरीय रणनीति के तहत हर वर्ग के कद्दावर नेताओं को मोर्चे पर उतारा है। प्रचार अभियान के दौरान जहां भाजपा ने विकास, सड़कों के जाल, सिंचाई और अपनी सरकार की उपलब्धियों पर जोर दिया, वहीं कांग्रेस ने बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और स्थानीय जनसमस्याओं को लेकर सरकार की घेराबंदी की।
