मिर्जापुर द मूवी ने बड़े पर्दे पर बरकरार रखा, भौकाल पुराने किरदारों का जादू कायम
तीन सफल और बेहद लोकप्रिय सीजन के बाद ‘मिर्जापुर’ अब छोटे पर्दे की सीमाओं से निकलकर बड़े पर्दे पर पहुंच गया है. गुरमीत सिंह के निर्देशन में बनी ‘मिर्जापुर द मूवी’ दर्शकों को एक बार फिर उसी दुनिया में ले जाती है, जहां सत्ता, बदला, राजनीति, कारोबार और वर्चस्व की लड़ाई सबसे ऊपर है. फिल्म में पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु, रसिका दुग्गल, श्रिया पिलगांवकर, श्वेता त्रिपाठी शर्मा और अभिषेक बनर्जी जैसे पुराने कलाकारों की वापसी हुई है, जबकि रवि किशन, मोहित मलिक और जितेंद्र कुमार जैसे कलाकार इस दुनिया में नया रंग जोड़ते हैं.
फिल्म की शुरुआत ही एक प्रभावशाली एक्शन दृश्य से होती है. गुड्डू और बबलू के किरदारों में अली फजल और जितेंद्र कुमार की मौजूदगी दर्शकों को तुरंत उस दुनिया की याद दिलाती है, जिसे वे पिछले तीन सीजन में देख चुके हैं. कहानी का केंद्रीय सवाल भी वही है—मिर्जापुर की गद्दी पर कौन बैठेगा और आखिर इस शहर पर राज किसका होगा?
पहले हिस्से में किरदारों और कहानी की जमीन तैयार
फिल्म का बड़ा हिस्सा पहले भाग में किरदारों और कहानी की पृष्ठभूमि तैयार करने में खर्च होता है. पहले सीजन की घटनाओं के संदर्भ भी बीच-बीच में आते हैं. जो दर्शक पूरी श्रृंखला देख चुके हैं, उनके लिए ये प्रसंग पुरानी कहानी को दोहराने जैसा अनुभव देते हैं, जबकि नए दर्शकों के लिए कहानी को समझने में मदद करते हैं.
पहले हिस्से में नाटक, एक्शन, दुश्मनी, राजनीति, सत्ता का खेल और कारोबार के साथ हास्य का भी संतुलित इस्तेमाल किया गया है. फिल्म की रफ्तार शुरुआती हिस्से में अच्छी बनी रहती है और कई दृश्यों में संवाद दर्शकों से सीधा जुड़ते हैं.
मध्यांतर से पहले कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती है, जहां आगे क्या होगा, इसे लेकर उत्सुकता पैदा होती है. हालांकि फिल्म में ऐसे बड़े अप्रत्याशित मोड़ या चौंकाने वाले रहस्य नहीं हैं, जो दर्शक को पूरी तरह हैरान कर दें, लेकिन इसके बावजूद पहला हिस्सा मनोरंजन बनाए रखता है.
कहानी में नया कम, अनुमान ज्यादा
‘मिर्जापुर द मूवी’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी है. तीनों सीजन देख चुके दर्शकों के लिए घटनाक्रम काफी हद तक अनुमान के मुताबिक आगे बढ़ता है. फिल्म में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है, जो इस स्थापित दुनिया में वास्तव में नया महसूस हो.
दूसरे हिस्से में यह समस्या और स्पष्ट हो जाती है. कहानी कुछ जगहों पर खिंची हुई महसूस होती है और फिल्म को थोड़ा छोटा किया जाता तो प्रभाव और बेहतर हो सकता था. पहले भाग की तुलना में दूसरे हिस्से की गति भी कुछ जगह धीमी पड़ती है.
फिर भी संवाद लेखन फिल्म की मजबूत कड़ी बना रहता है. कई संवाद ऐसे हैं, जिन पर दर्शकों की तालियां और सीटियां स्वाभाविक रूप से निकलती हैं. खासतौर पर पंकज त्रिपाठी और दिव्येंदु के बीच के दृश्य फिल्म के सबसे प्रभावशाली हिस्सों में शामिल हैं.
पंकज त्रिपाठी और दिव्येंदु फिर छाए
‘मिर्जापुर’ की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उसके किरदार और कलाकार रहे हैं और फिल्म में भी यह बात कायम रहती है. पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु, रसिका दुग्गल, श्रिया पिलगांवकर, अभिषेक बनर्जी और श्वेता त्रिपाठी शर्मा अपने पुराने किरदारों में सहज नजर आते हैं.
पंकज त्रिपाठी और दिव्येंदु की जोड़ी विशेष रूप से प्रभावशाली रहती है. दोनों के बीच के संवाद, अभिनय और पर्दे पर उनकी मौजूदगी पुराने दर्शकों को श्रृंखला के उसी अंदाज की याद दिलाती है, जिसके लिए ‘मिर्जापुर’ पहचाना जाता है.
अली फजल भी अपने किरदार की आक्रामकता और तेवर को प्रभावी ढंग से सामने लाते हैं. वहीं रसिका दुग्गल, श्रिया पिलगांवकर, अभिषेक बनर्जी और श्वेता त्रिपाठी शर्मा अपने-अपने किरदारों में सहज दिखाई देते हैं.
नई एंट्री भी कहानी के माहौल में फिट बैठती हैं. रवि किशन, मोहित मलिक और जितेंद्र कुमार अपने किरदारों में अलग रंग जोड़ते हैं और पहले से स्थापित दुनिया को कुछ नया स्वाद देते हैं.
निर्देशन में वही पुराना अंदाज
निर्देशक गुरमीत सिंह ने ‘मिर्जापुर’ की मूल पहचान को बरकरार रखने की कोशिश की है. एक्शन, राजनीति, सत्ता संघर्ष और आपसी दुश्मनी को उसी अंदाज में प्रस्तुत किया गया है, जिससे श्रृंखला के दर्शक पहले से परिचित हैं.
निर्देशन की सबसे बड़ी सफलता यह है कि फिल्म अपने मूल माहौल से बहुत दूर नहीं जाती. बड़े पर्दे पर पहुंचने के बावजूद इसका तेवर और किरदारों की भाषा वही रहती है. हालांकि दूसरे भाग में कहानी को कुछ ज्यादा कसाव की जरूरत महसूस होती है.
संगीत कहानी के साथ चलता है
फिल्म का संगीत कहानी पर हावी होने के बजाय उसके साथ चलता है. ‘वारूं’ और ‘सांसों की माला’ जैसे गीत कहानी में रोमांटिक रंग जोड़ते हैं. वहीं कुछ एक्शन दृश्यों के दौरान राजस्थानी और हरियाणवी संगीत का इस्तेमाल माहौल के अनुरूप किया गया है.
संगीत का इस्तेमाल इस तरह किया गया है कि वह कहानी की गति को बाधित नहीं करता और संबंधित दृश्यों के भाव को मजबूत करता है.
दर्शकों के लिए कैसी है फिल्म?
‘मिर्जापुर द मूवी’ अपनी चर्चित श्रृंखला को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश नहीं करती. इसके बजाय यह पुराने और लोकप्रिय किरदारों को एक बड़े पर्दे के अनुभव में फिर से सामने लाती है. यही वजह है कि फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसके किरदार और उनसे जुड़ी दर्शकों की पुरानी यादें हैं.
कहानी में नयापन अपेक्षाकृत कम है और दूसरे हिस्से का खिंचाव फिल्म को बेहतरीन बनने से रोकता है. लेकिन अगर आप ‘मिर्जापुर’ के प्रशंसक हैं और गुड्डू, कालीन भैया, मुन्ना और इस दुनिया के दूसरे किरदारों को एक बार फिर बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं, तो फिल्म निराश नहीं करेगी.
कुल मिलाकर ‘मिर्जापुर द मूवी’ एक ठीक-ठाक बड़े पर्दे का विस्तार है—भौकाल कायम है, किरदारों का असर बरकरार है, लेकिन कहानी में वह नया विस्फोट नहीं है जिसकी उम्मीद तीन सीजन की सफलता के बाद की जा सकती थी.
और एक जरूरी बात—फिल्म के अंतिम क्रेडिट शुरू होते ही सिनेमाघर से बाहर न निकलें. क्रेडिट के बाद आने वाला दृश्य कहानी के लिहाज से खास है और फिल्म के कुछ दिलचस्प क्षणों में शामिल है. इसलिए आखिरी दृश्य तक अपनी सीट पर बने रहना बेहतर होगा.
