प्रदेश की चार पारंपरिक उपजों को मिला जीआई टैग
महाकौशल के आदिवासी किसानों की बदलेगी तकदीर
भोपाल। कृषि क्षेत्र ने वैश्विक पटल पर एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। प्रदेश की चार विशिष्ट एवं पारंपरिक कृषि उपजों सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी, बैंगनी अरहर और छत्रिय धान को आधिकारिक तौर पर भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) प्रदान किया गया है। इस उपलब्धि से न केवल प्रदेश की समृद्ध कृषि विरासत को कानूनी संरक्षण मिलेगा, बल्कि महाकौशल क्षेत्र के आदिवासी किसानों के लिए समृद्धि के नए द्वार खुलेंगे। इस घोषणा के बाद से ही क्षेत्र के अन्नदाताओं में हर्ष की लहर है।
यह ऐतिहासिक सफलता किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के कुशल मार्गदर्शन, मध्यप्रदेश राज्य कृषि विपणन मंडी बोर्ड के सक्रिय सहयोग और जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के वैज्ञानिकों व तकनीकी विशेषज्ञों के अथक प्रयासों का परिणाम है। जीआई टैग मिलने से अब इन उत्पादों की ब्रांड वैल्यू और बाजार प्रतिस्पर्धात्मकता में भारी इजाफा होगा। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगेगी, कृषि निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और सीधे तौर पर किसानों को उनकी उपज का बेहतर व लाभकारी मूल्य मिल सकेगा। इससे पहले विभाग के प्रयासों से सीहोर के शरबती गेहूं और रीवा के सुंदरजा आम को भी जीआई टैग मिल चुका है।
सताही कुटकी
सिताही कुटकी यह महज 60 दिनों में पककर तैयार होने वाली लिटल मिलेट (छोटे बाजरे) की एक देशी किस्म है। यह फसल सूखे, नमी की कमी और शूट फ्लाई जैसे घातक कीटों व बीमारियों से लड़ने में पूरी तरह सक्षम है। मोटे तने के कारण यह तेज हवाओं में भी नहीं गिरती। महाकौषल के डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर, छिंदवाड़ा, शहडोल, उमरिया, बालाघाट और जबलपुर के लगभग 60,000 आदिवासी किसान (विशेषकर बैगा और गोंड जनजाति) इससे लाभान्वित हो रहे हैं। डिंडोरी के पहाड़ी व दुर्गम इलाकों के 54 गांवों के लिए यह फसल वरदान साबित हो रही है, जहां रबी की अन्य फसलें नहीं उगाई जा सकतीं।
औषधीय गुणों से भरपूर नागदमन कुटकी
मुख्य रूप से डिंडोरी जिले में उगाई जाने वाली कुटकी की यह एक बेहद विशिष्ट स्थानीय किस्म है। यह अपने उच्च पोषण मूल्य और अद्वितीय औषधीय गुणों के लिए जानी जाती है, जिसकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग है।
प्रोटीन का पावरहाउस है बैंगनी अरहर
अरहर की इस अनोखी किस्म के पौधों और फलियों पर एक खूबसूरत बैंगनी रंग की झलक दिखाई देती है। यह न केवल रोगों से लड़ने की जबरदस्त क्षमता रखती है, बल्कि इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। बेहतर कृषि प्रबंधन और अच्छी देखभाल के साथ इसका उत्पादन 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक लिया जा सकता है।
महाकौशल की शान छत्रिय धान
इस विशिष्ट धान को भी इसकी अनूठी सुगंध, स्वाद और पारंपरिक महत्व के कारण जीआई टैग की सूची में शामिल किया गया है, जो महाकौशल के कृषि जैव-विविधता संरक्षण में मील का पत्थर साबित होगा।
