आदिवासी सीटों पर टिकी भाजपा और कांग्रेस की नजरें
भाजपा का धार में बड़ा कार्यक्रम आज, कांग्रेस के सिंघार सक्रिय हैं मोर्चे पर
भोपाल। भले ही मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव 2028 में होने हैं, मगर राज्य की सियासी फिजा अभी से गर्माने लगी है। प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस ने चुनावी मोर्चेबंदी शुरू करते हुए जातिगत समीकरण साधने की कवायद तेज कर दी है। दोनों ही दलों की नजरें विशेष रूप से आदिवासी बहुल 47 आरक्षित सीटों पर टिकी हैं, जिन पर निर्णायक मतदाता प्रभाव डालते हैं।
राजनीतिक हलकों में सरगर्मी उस समय और तेज हो गई जब भाजपा द्वारा धार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में 17 सितंबर को एक बड़े कार्यक्रम किया जा रहा है। यह प्रधानमंत्री मोदी का बीते 20 महीनों में आठवां मध्यप्रदेश दौरा होगा। धार के पहले, प्रधानमंत्री मोदी झाबुआ में जनजातीय सम्मेलन को संबोधित कर चुके हैं, वहीं भोपाल, छतरपुर, अशोकनगर और बागेश्वरधाम जैसे क्षेत्रों में भी उनके दौरे हो चुके हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के शपथग्रहण के बाद से प्रधानमंत्री के सभी दौरे जातिगत व क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखकर किए गए हैं, जिससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि भाजपा 2028 के चुनाव की बुनियाद अभी से मजबूत करना चाहती है। इसमें आदिवासी अंचल पर उसका पूरा फोकस भी हैं।
संघ की भी सक्रियता बढ़ी
भाजपा के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी मैदान में उतर चुका है। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत पिछले आठ महीनों में चार बार इंदौर का दौरा कर चुके हैं। उनका हालिया दौरा 13-14 सितंबर को हुआ है। इससे पहले वे 3 जनवरी, 13 जनवरी और 10 अगस्त को भी संघीय कार्यक्रमों में शरीक हुए थे। इन दौरों के बाद मालवा अंचल में संघ की गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
कांग्रेस ने भी बढ़ाई सक्रियता
हालांकि कांग्रेस की शीर्ष नेतृत्व की सक्रियता सीमित रही है, फिर भी पार्टी आदिवासी अंचलों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार लगातार सिंगरौली, सीधी, डिंडोरी, अनूपपुर, मंडला, आलीराजपुर, धार, उमरिया और बैतूल जैसे आदिवासी बहुल जिलों का दौरा कर रहे हैं। वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी मालवा क्षेत्र में विशेष रूप से सक्रिय हैं।
आदिवासी सीटें सरकार बनाने में निभाती है अहम भूमिका
राज्य की कुल 230 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जबकि करीब 30 अन्य सीटों पर आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इन 47 में से 30 सीटें मिली थीं, हालांकि फिलहाल उसके पास 22 सीटें हैं। भाजपा इस समीकरण को अपने पक्ष में मोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस इसे बचाने में जुटी है।
