बंगाल में सियासी तापमान बढ़ा सुबेंदु अधिकारी ने वामनिपुण सरकार और I-PAC के कथित गठजोड़ की जांच मांगी
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक समीकरणों पर गरमाती बहस को और तेज करते हुए, राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुबेंदु अधिकारी ने केंद्र सरकार से राज्य प्रशासन और इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के बीच कथित “अशुभ और अवैध मिलीभगत” की जांच कराने की मांग की है. अधिकारी ने यह अनुरोध केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव को लिखे एक पत्र के माध्यम से किया.
अधिकारी ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) हैंडल पर पोस्ट करते हुए कहा— “मैंने माननीय केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव जी को पत्र लिखकर पश्चिम बंगाल प्रशासन और इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के बीच कथित अशुभ और अवैध मिलीभगत की त्वरित जांच कराने का अनुरोध किया है.”
I-PAC, जिसे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने स्थापित किया था, हाल के वर्षों में विभिन्न राज्यों में राजनीतिक अभियानों में सक्रिय रूप से शामिल रहा है और 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए चुनावी रणनीति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि यह संस्था केवल एक “सलाहकार निकाय” की तरह कार्य नहीं कर रही, बल्कि सरकारी तंत्र के साथ तालमेल बैठाकर राजनीतिक लाभ दिलाने का काम कर रही है.
आरोपों की पृष्ठभूमि
सुबेंदु अधिकारी का आरोप है कि I-PAC को सरकारी संसाधनों, डेटा और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म तक विशेष पहुंच दी गई, जो न केवल निष्पक्ष राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि सूचना प्रौद्योगिकी और गोपनीयता संबंधी कानूनों का भी उल्लंघन हो सकता है.
विपक्ष के अनुसार, यह गठजोड़ चुनावी निष्पक्षता और प्रशासनिक तटस्थता के लिए गंभीर खतरा है.
राज्य के सत्ताधारी दल के नेताओं ने अभी तक इन आरोपों पर औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन टीएमसी के कुछ अनौपचारिक बयानों में इन दावों को “बेतुका” और “राजनीतिक नाटक” बताया गया है.
कानूनी और राजनीतिक प्रभाव
अगर केंद्रीय मंत्रालय इस मामले की जांच के आदेश देता है, तो यह न केवल I-PAC की कार्यप्रणाली पर बल्कि चुनावी परामर्श देने वाली निजी एजेंसियों की कानूनी स्थिति पर भी एक मिसाल कायम कर सकता है. भारतीय कानूनों में फिलहाल राजनीतिक परामर्श कंपनियों की गतिविधियों के लिए स्पष्ट नियामकीय ढांचा नहीं है, जिससे इस तरह के आरोपों की जांच और भी जटिल हो जाती है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विवाद का समय भी महत्वपूर्ण है—2026 के विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल की राजनीति में पहले से ही ध्रुवीकरण की स्थिति है. इस तरह के आरोप न केवल टीएमसी की छवि पर असर डाल सकते हैं, बल्कि भाजपा और अन्य विपक्षी दलों को चुनावी नैरेटिव बदलने का मौका भी दे सकते हैं.
डिजिटल युग में चुनावी रणनीति का संकट
पिछले दशक में भारतीय राजनीति में डिजिटल कैंपेनिंग और डाटा-ड्रिवन स्ट्रैटेजी का महत्व तेजी से बढ़ा है. लेकिन जब इन रणनीतियों में सरकारी संसाधनों या डेटा का दुरुपयोग होने के आरोप लगते हैं, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल राज्य प्रशासन के लिए बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी चुनावी आचार संहिता और सूचना सुरक्षा मानकों में बड़े बदलाव की मांग को जन्म देगा.
सुबेंदु अधिकारी की मांग अब केंद्र सरकार के पाले में है. अगर जांच शुरू होती है, तो यह आने वाले महीनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति का प्रमुख मुद्दा बन सकती है. वहीं, अगर केंद्र इस मामले को टालता है, तो विपक्ष इसे भी राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करेगा.
एक ओर I-PAC जैसे संगठनों की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी ओर यह मामला भारतीय लोकतंत्र में चुनावी पारदर्शिता और डिजिटल नैतिकता की सीमाओं को परिभाषित करने वाला साबित हो सकता है.
