नर्मदा की सहायक परियट नदी बनी गोबर की नदी
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य ने जबलपुर प्रवास के दौरान लोगों से किया संवाद
भोपाल। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने अपने जबलपुर प्रवास के दौरान क्षेत्र की जीवनदायिनी नदियों की बदहाली और स्थानीय आजीविका पर मंडराते संकट को लेकर एक बड़ी पहल शुरू की है। सोशल मीडिया पर जबलपुर की परियट नदी की दुर्दशा को उजागर करते हुए उन्होंने इसे गोबर की नदी करार दिया। कानूनगो ने प्रशासनिक संवादहीनता को तोड़ते हुए स्थानीय किसानों और डेरी संचालकों से सीधा संवाद भी किया।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य कानूनगो इसे लेकर सोषल मीडिया पर पोस्ट किया है। जिसमें उन्होंने व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि भारत का यह दुर्भाग्य है कि गोबर जैसे बायोडिग्रेडेबल (जैविक रूप से नष्ट होने वाले) अपशिष्ट का उचित प्रबंधन नहीं हो पा रहा है। इसके कारण जबलपुर में बहने वाली और हिरण नदी के माध्यम से नर्मदा में मिलने वाली परियट नदी आज पूरी तरह गोबर की नदी में तब्दील होकर अपना अस्तित्व खो चुकी है। उन्होंने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि यहाँ के अफसर अंग्रेजों के जमाने के सरकारी एजेंट की तरह केवल भय का माहौल बनाने का काम कर रहे हैं।
भय के माहौल के बीच संवाद की शुरुआत
क्षेत्र में जमीनी हकीकत का जायजा लेने पहुंचे कानूनगो ने बताया कि प्रशासनिक लापरवाही और अफसरों की अनुपस्थिति के कारण डेरी संचालकों में भारी डर और संशय का माहौल है। वे अपनी बात रखने से भी कतरा रहे हैं। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारियों की गैरमौजूदगी के बीच, युवा मोर्चा के उपाध्यक्ष योगेंद्र ठाकुर और स्थानीय कार्यकर्ताओं की मदद से डेरी संचालकों और किसानों को भरोसे में लेकर संवाद की शुरुआत की गई है।
एक लाख लोगों की आजीविका दांव पर
प्रियंक कानूनगो ने आंकड़ों के जरिए इस क्षेत्र के आर्थिक महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि शहर के बाहरी ग्रामीण इलाके के महज 4 किलोमीटर के दायरे में 200 से अधिक डेरियां संचालित हैं। ये इकाइयां रोजाना 2 लाख लीटर दूध का उत्पादन करती हैं। इससे 15,000 श्रमिकों को सीधा रोजगार मिला हुआ है। यह उद्योग हरा चारा, भूसा, खली, गुड़ और चपड़ी की खरीद कर हजारों किसानों की आय बढ़ाने का जरिया बना हुआ है। सप्लाई नेटवर्क को मिलाकर यह पूरा तंत्र एक लाख से अधिक लोगों की आजीविका का मुख्य साधन है।
तुगलकी फरमानों से बंद हुईं सैकड़ों डेरियां
उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि स्थानीय प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कुप्रबंधन के कारण यहां पहले ही सैकड़ों डेरियां बंद हो चुकी हैं और बची हुई इकाइयों को भी हटाने या बंद करने के लगातार फरमान जारी किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस संवेदनशील मुद्दे का समाधान केवल डराने से नहीं बल्कि संवाद से ही संभव है। उन्होंने कहा कि हमने संवेदनशीलता के साथ समाधान के लिए संवाद का यह प्रयास शुरू किया है। इस चर्चा से जो भी निष्कर्ष निकलेगा, उसके आधार पर मानवीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए सरकार को उचित और ठोस अनुशंसाएं भेजी जाएंगी, ताकि पर्यावरण का संरक्षण भी हो और लाखों लोगों का रोजगार भी बचे।
