बारदाने की कमी गेहूं खरीदी में खड़ा कर सकती है संकट
भोपाल। प्रदेश में 1 अप्रैल से समर्थन मूल्य पर शुरू होने वाली गेहूं खरीदी इस बार सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होने वाली है। एक ओर युद्ध के चलते उपजे अंतरराष्ट्रीय संकट ने जूट और पीपी बैग्स (पॉलीप्रोपाइलीन) की सप्लाई चेन तोड़ दी है, वहीं दूसरी ओर केंद्र द्वारा खरीदी का लक्ष्य न बढ़ाने से राज्य पर भारी वित्तीय बोझ पड़ने की आशंका गहरा गई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस सीजन की खरीदी के लिए लगभग 2 करोड़ पीपी बैग्स की दरकार है, जबकि वर्तमान में केवल 50 लाख बैग ही उपलब्ध हैं। आपूर्ति में आ रही इस बाधा के पीछे वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण पीपी बैग्स के कच्चे माल का उत्पादन और परिवहन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहीं पड़ौसी देश बांग्लादेश से भी फिलहाल बोरियों की खेप मिलने की संभावनाएं नगण्य हैं। बोरियों के लिए फिलहाल सरकार के पास कोई वैकल्पिक बैकअप प्लान तैयार नहीं है।
लक्ष्य और बजट की खींचतान
केंद्र सरकार ने मध्यप्रदेश के लिए 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदी का लक्ष्य तय किया है। हालांकि, राज्य सरकार का अनुमान है कि बंपर पैदावार और किसानों की मांग के चलते खरीदी इस आंकड़े को पार कर जाएगी। केंद्र ने राज्य की मांग के बावजूद लक्ष्य में केवल 1 मीट्रिक टन की मामूली बढ़ोतरी की है और केंद्रीयकृत खरीद योजना को मंजूरी देने से इनकार कर दिया है। इसका सीधा अर्थ है कि लक्ष्य से अधिक खरीदे गए गेहूं का पूरा वित्तीय भार और भंडारण का खर्च राज्य सरकार को अपनी जेब से उठाना होगा।
भंडारण की भी समस्या
सिर्फ खरीदी ही नहीं, बल्कि खरीदे गए अनाज को सुरक्षित रखने के लिए गोदामों की व्यवस्था करना भी प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। अतिरिक्त गेहूं के रखरखाव के लिए सरकार को करोड़ों रुपये की अतिरिक्त राशि जुटानी होगी, जो पहले से ही सीमित संसाधनों से जूझ रहे राज्य के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन सकती है।
