रसूख घटा तो जनता के बीच लौटने लगे कद्दावर नेता
ले रहे सोशल मीडिया और व्यक्तिगत दौरों का सहारा
भोपाल। प्रदेश की सियासत में एक दौर वह था जब कांग्रेस के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरूण यादव के इशारे पर संगठन की दिशा तय होती थी। सत्ता रही हो या विपक्ष, इनकी तूती बोलती थी। लेकिन आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा है कि प्रदेश कांग्रेस के ये कद्दावर चेहरे अपनी ही पार्टी के भीतर नेपथ्य में चले गए हैं। अब जब संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिली और दिल्ली दरबार की टेढ़ी नजरें सामने हैं, तो इन नेताओं ने अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए फिर से धूल फांकना शुरू कर दिया है।
हाल ही में दिल्ली में हुई एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक ने इन वरिष्ठ नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। केंद्रीय नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल पुराने रसूख के दम पर राजनीति नहीं चलेगी। जो नेता अपने क्षेत्र या घर तक सीमित हैं, पार्टी उनके विकल्प तलाशने में देरी नहीं करेगी। नेतृत्व ने शर्त रखी है कि सक्रियता तभी मानी जाएगी जब नेता अपने प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकलकर कार्यकर्ताओं को जोड़ेंगे। बस इसी डर और मजबूरी ने इन दिग्गजों को एक बार फिर सक्रिय कर दिया है। कुल मिलाकर, प्रदेश कांग्रेस के इन दिग्गजों की यह छटपटाहट बताती है कि राजनीति में पद और कद के बीच की दूरी कितनी घातक हो सकती है। संगठन में जिम्मेदारी न होने के बावजूद इन नेताओं का मैदान में उतरना, कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने और दिल्ली दरबार की गुड-बुक में वापसी की एक सोची-समझी कोशिश है।
विंध्य छोड़ बुंदेलखंड और ग्वालियर-चंबल में डेरा
कभी नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहने वाले पूर्व मंत्री अजय सिंह राहुल के पास वर्तमान में संगठन की कोई बड़ी कमान नहीं है। मुख्यधारा से कटने के खतरे को भांपते हुए उन्होंने खुद ही मोर्चा संभाल लिया है। ग्वालियर-चंबल अंचल के दौरे के बाद उन्होंने बुंदेलखंड के प्रवास किया। बिना किसी आधिकारिक पद के अकेले ही कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करना उनकी उस रणनीति का हिस्सा है, जिससे वे दिल्ली को यह संदेश दे सकें कि कार्यकर्ताओं के बीच आज भी उनका वजूद कायम है। मजेदार बात यह है कि अजय सिंह खुद विंध्य का प्रतिनिधित्व करते हैं और अपने प्रभाव वाले अंचल में ही पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिरा है। 2023 के विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस को इस अंचल की तीस सीटों में से मात्र छह सीटों पर ही जीत हासिल हुई है।
सोशल मीडिया से जमीनी रैलियों तक का सफर
पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव, अध्यक्ष की कुर्सी से उतरने के बाद लगभग हाशिए पर चले गए थे। संगठन की बड़ी गतिविधियों में उनकी भूमिका सीमित हो गई। अब खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए उन्होंने हाइब्रिड राजनीति का सहारा लिया है। वे सोशल मीडिया पर जहां लगातार सक्रिय हैं, वहीं अपने प्रभाव वाले निमाड़ अंचल के चिन्हित नगरों का दौरा कर पुराने वफादार कार्यकर्ताओं की फौज को एकजुट कर रहे हैं। उनके लिए यह दौर केवल राजनीति नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान को बचाए रखने का संघर्ष है। यादव को भय है कि अगर अब उनका अपने ही अंचल में प्रभाव नजर नहीं आया तो प्रदेश संगठन में वे अपने को किस तरह बड़ा नेता साबित करेंगे।
विरासत बचाने को विशेष जतन
पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया भी उन नेताओं की कतार में हैं, जिन्हें अब अपनी जगह बनाने के लिए अतिरिक्त पसीना बहाना पड़ रहा है। पूरे प्रदेश में कभी अपनी पैठ रखने वाले भूरिया के सामने अब नेतृत्व को अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का संकट है। हालांकि उनके पुत्र डॉ. विक्रांत भूरिया अपनी सक्रियता से पिता की विरासत को सहारा दे रहे हैं, लेकिन कांतिलाल भूरिया खुद भी दौरों के जरिए यह साबित करने में जुटे हैं कि आदिवासी अंचल में उनका प्रभाव कम नहीं हुआ है। भूरिया आदिवासी अंचल में फिर से अपना प्रभाव जमाना चाहते है, मगर संकट इस बात का है कि अब उनका वैसा प्रभाव नजर नहीं आ रहा, जिस तरह पहले कभी रहा है।
