हाईटेक हुई गिद्धों की गिनती, राजधानी सहित प्रदेश में बढ़ा कुनबा
भोपाल। राजधानी और आसपास के क्षेत्रों से लुप्त हो रहे पारिस्थितिकी तंत्र के सफाईकर्मियों यानी गिद्धों को बचाने की दिशा में एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। इस बार गिद्धों की गणना न केवल हाईटेक रही, बल्कि सैटेलाइट टैगिंग के जरिए उनकी जीवनशैली और गतिविधियों को समझने के गंभीर प्रयास भी किए गए।
इन संरक्षण प्रयासों का सुखद परिणाम यह रहा कि प्रदेश में पिछले एक दशक में गिद्धों की आबादी लगभग दोगुनी हो गई है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में गिद्धों की संख्या वर्ष 2016 के 6,999 से बढ़कर 2026 में 13,500 तक पहुँच गई है। राजधानी में गिद्धों का कुनबा 900 के पार पहुंच चुका है। वन विभाग और स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त प्रयासों से डाइक्लोफेनाक जैसी हानिकारक पशु दवाओं पर लगाई गई कड़ी रोक इस वृद्धि का मुख्य कारण बनी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस दवा के कारण गिद्धों की किडनी फेल हो जाती थी, जिससे उनकी आबादी तेजी से घट रही थी।
पहली बार ऑनलाइन ऐप से गणना
इस बार की जनगणना में तकनीक का भरपूर उपयोग किया गया। प्रदेश में पहली बार डिजिटल ऐप के माध्यम से डेटा इकट्ठा किया गया, जिससे मानवीय त्रुटि की संभावना कम हुई और सटीक आंकड़े सामने आए। प्रदेश में गिद्धों की कुल 7 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें 4 स्थानीय और 3 प्रवासी हैं।
सैटेलाइट टैगिंग से खुलेगी जीवनशैली की परतें
गिद्धों के व्यवहार को समझने के लिए उन्हें विशेष डिवाइस से लैस किया गया है। यह हाईटेक यंत्र वैज्ञानिकों को डेटा भेजता है। जिसके तहत गिद्ध की सटीक लोकेशन, उड़ान की ऊंचाई और विचरण का क्षेत्र और पसंदीदा आवास की जानकारी आसानी से मिल जाती है। इस तकनीक की मदद से अब उन क्षेत्रों को और बेहतर ढंग से संरक्षित किया जा सकेगा, जहाँ ये पक्षी सबसे अधिक समय बिताते हैं।
