98 करोड़ की वसूली नहीं और खुद भर दिया 15 करोड़ का जीएसटी
कैग की रिपोर्ट, जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी में भारी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का खुलासा
भोपाल। प्रदेश की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी (आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय) इस समय गंभीर सवालों के घेरे में है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट ने यूनिवर्सिटी के कामकाज की कलई खोलकर रख दी है। रिपोर्ट में न केवल प्रशासनिक लापरवाही की बात कही गई है, बल्कि यूनिवर्सिटी में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की प्रबल संभावना भी जताई गई है। रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कियूनिवर्सिटी में डिग्री के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जा रही है।
यूनिवर्सिटी की स्थापना को 12 साल बीत चुके हैं, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार इसका प्रशासनिक ढांचा आज भी कागजों तक ही सीमित है। अभी तक यूनिवर्सिटी में एकेडमिक काउंसिल का गठन नहीं हुआ है। एग्जामिनर्स और मॉडरेटर्स के चयन के लिए कोई आधिकारिक कमेटी नहीं है, जिससे चहेतों को मनमाने ढंग से काम बांटने का रास्ता साफ हो गया। यूनिवर्सिटी में स्टाफ की भारी कमी है। स्वीकृत 275 पदों में से केवल 91 कर्मचारी ही कार्यरत हैं। रेक्टर, फाइनेंस ऑफिसर और असिस्टेंट रजिस्ट्रार जैसे महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं।
वित्तीय प्रबंधन को लेकर उठाए सवाल
कैग ने वित्तीय प्रबंधन पर कड़े सवाल उठाए हैं। बैलेंस शीट पेश करने में विफलता ने गड़बड़ियों के शक को और पुख्ता कर दिया है। संबंधित कॉलेजों से 98 करोड़ रुपये का एंडोमेंट फंड इकट्ठा नहीं किया गया। नियमानुसार कॉलेजों से 23 करोड़ रुपये जीएसटी वसूलना था, लेकिन यूनिवर्सिटी ने उसे वसूलने के बजाय अपने ही खातों से 15 करोड़ रुपये जमा कर दिए। सालाना अकाउंट्स और बैलेंस शीट समय पर तैयार न होने से भ्रष्टाचार की आशंका जताई गई है।
सॉफ्टवेयर नहीं, डेटा में हेर फेर की गुंजाइश
डिजिटल इंडिया के दौर में भी यूनिवर्सिटी का परीक्षा विभाग आदिम युग में जी रहा है। एग्जामिनेशन सिस्टम के लिए कोई सॉफ्टवेयर न होने के कारण अधिकारी मैनुअली (हाथ से) काम कर रहे हैं। इससे डेटा में हेरफेर और गड़बड़ी की गुंजाइश बढ़ गई है।
नर्सिंग कॉलेजों की मनमानी और शून्य निरीक्षण
रिपोर्ट में नर्सिंग कॉलेजों के साथ यूनिवर्सिटी की मिलीभगत की ओर भी इशारा किया गया है। कई नर्सिंग कॉलेजों ने बिना एफिलिएशन (संबद्धता) लिए ही एडमिशन शुरू कर दिए हैं। हैरानी की बात यह है कि यूनिवर्सिटी ने इन कॉलेजों का निरीक्षण करना भी जरूरी नहीं समझा।
