कैग ने 2019 में बताई थी खामियां, नगर निगमों ने किया नजरअंदाज
उमंग सिंघार ने कैग की रिपोर्ट का दिया हवाला, कहा एडीबी कर्ज से चले जल प्रबंधन प्रोजेक्ट में भारी गड़बड़ियां
भोपाल। इंदौर में गंदा पानी पीने से अब तक लोगों की मौत के बाद मध्य प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कैग की 2019 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए राज्य सरकार पर गंभीर लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि अगर सरकार कैग की चेतावनी को गंभीरता से लेती तो बड़ा हादसा होने से बचा जा सकता था।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा है कि इंदौर में गंदे पानी से हुई मौतें कोई अचानक हुई त्रासदी नहीं हैं, बल्कि सरकार की वर्षों की अनदेखी का नतीजा हैं। उन्होंने याद दिलाया कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने वर्ष 2019 में ही भोपाल और इंदौर में सप्लाई हो रहे गंदे और दूषित पानी को लेकर गंभीर चेतावनी दी थी, साथ ही सुधार के स्पष्ट सुझाव भी दिए थे। लेकिन सरकार ने न तब सुना और न अब तक कोई ठोस कार्रवाई की।
करोड़ों का कर्ज लिया, साफ पानी नहीं कराया उपलब्ध
सिंघार ने बताया कि मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2004 में एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) से 200 मिलियन डॉलर (तत्कालीन 906.4 करोड़ रुपये) का कर्ज लिया था। यह कर्ज भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में जल प्रबंधन सुधारने, पानी की आपूर्ति बढ़ाने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए 25 साल की अवधि के लिए लिया गया था। परियोजना का लक्ष्य हर नागरिक को पर्याप्त और साफ पानी उपलब्ध कराना था।
रिपोर्ट में गंभीर खामियांं का किया था खुलासा
करीब 15 साल बाद, 2019 में कैग ने भोपाल और इंदौर के जल प्रबंधन पर रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में परियोजना के काम को अपर्याप्त बताते हुए गंभीर खामियां और भ्रष्टाचार उजागर किया गया। नेता प्रतिपक्ष का कहना है कि रिपोर्ट आने के बावजूद सरकार ने न जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई की और न ही सिस्टम सुधारने के लिए कदम उठाए। कैग रिपोर्ट के अनुसार, इंदौर में केवल चार जोनों और भोपाल में सिर्फ पांच जोनों में ही रोजाना पानी की आपूर्ति हो पा रही है। दोनों शहरों के कुल 9.41 लाख परिवारों में से महज 5.30 लाख परिवारों को ही नल कनेक्शन मिले हैं। पानी के रिसाव की शिकायतों पर नगर निगम 22 दिन से लेकर 182 दिन तक का समय लगा देता है।
जांच में पीने योग्य नहीं पाया था पानी
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 2013 से 2018 के बीच लिए गए 4,481 पानी के नमूने (भौतिक, रासायनिक और जीवाणु परीक्षण) पीने योग्य नहीं पाए गए, लेकिन रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं है कि नगर निगम ने इन पर क्या कार्रवाई की। स्वतंत्र जांच में 54 नमूनों में से 10 में गंदगी और मल कोलिफॉर्म पाए गए, जिससे भोपाल के 3.62 लाख और इंदौर के 5.33 लाख, यानी कुल 8.95 लाख लोगों को दूषित पानी मिला। सिंघार ने कहा कि इसी अवधि में स्वास्थ्य विभाग ने 5.45 लाख जल जनित बीमारियों के मामले दर्ज किए। इसके बावजूद न तो जल आपूर्ति की नियमित जांच हुई और न ही ओवरहेड टैंकों की समय-समय पर सफाई की गई।
