पदोन्नति के नये नियमों पर उठे सवाल, मुखर हो सकते हैं स्वर
कर्मचारी नेता कर रहे अध्ययन, बता रहे व्यवस्था में हैं गंभीर विसंगतियां
भोपाल। प्रदेश सरकार द्वारा पदोन्नति को लेकर लागू किए गए नये नियमों पर सवाल उठने लगे हैं। कर्मचारी संगठनों ने इस व्यवस्था को पक्षपातपूर्ण और प्रशासनिक संतुलन के विरुद्ध बताया है। वहीं सरकार ने नाराजगी को पूर्व में ही भांपते हुए किसी संभावित अदालती चुनौती को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर दी है।
मंत्रालय सेवा अधिकारी कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सुधीर नायक ने आरोप लगाया है कि नए नियमों में तीनों वर्गों (सामान्य, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति) की अलग-अलग विचारण सूची बनाने के बजाय, एक साझा विचारण सूची (कामन सीनियरिटी लिस्ट) बनाई जा रही है, जो व्यावहारिक और न्यायपूर्ण नहीं है। नायक के अनुसार, सरकार ने यह भी कहा है कि आरक्षण कोटा भरने के बाद जो आरक्षित वर्ग के कर्मचारी पदोन्नति से वंचित रह जाते हैं, उन्हें अब सामान्य श्रेणी की रिक्तियों के लिए भी योग्य माना जाएगा। यही वह विवादास्पद प्रावधान है, जिसके चलते पहले उच्च पदों पर आरक्षण सौ फीसदी तक पहुंच गया था और मामला अदालतों तक गया था। हालांकि पदोन्नति के नए नियमों का राजपत्र जारी करने के साथ ही सरकार ने कर्मचारियों की नाराजगी को भी भांप लिया था। इसके चलते सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर कर दी है ताकि किसी संभावित याचिका पर एकतरफा आदेश न हो सके। ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले समय में यह मसला अदालत की चौखट तक पहुंच सकता है।
कृपांक व्यवस्था पर भी ऐतराज़
नये नियमों में आरक्षित वर्ग के कर्मचारी अगर पदोन्नति के लिए निर्धारित अंक नहीं प्राप्त कर पाते हैं तो उन्हें एक अतिरिक्त कृपांक देने का प्रावधान है। नायक ने इसे योग्यता के सिद्धांत के खिलाफ बताते हुए कहा कि हर स्तर पर सहारे की व्यवस्था कर दी गई है। संघ का कहना है कि आरक्षित वर्ग में उपयुक्त अभ्यर्थी नहीं मिलने की स्थिति में पद रिक्त रखे जाएंगे। इसका असर सरकारी कार्यों पर पड़ेगा और भविष्य में सामान्य वर्ग की रिक्तियों में कटौती होगी। 2025 में पात्र व्यक्ति नहीं मिले तो 2030 के योग्य उम्मीदवारों को इसकी सज़ा क्यों मिले?
पुराने नियमों की अनदेखी
नायक ने यह भी कहा कि पूर्ववर्ती नियमों में आरक्षित वर्ग के वे अभ्यर्थी जो अनारक्षित कोटे में चयनित होते थे, उनके समायोजन की स्पष्ट व्यवस्था थी। अब नये नियमों में यह व्यवस्था ही हटा दी गई है। नये नियमों के अनुसार पदोन्नति समिति में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से एक-एक सदस्य की उपस्थिति अनिवार्य की गई है। इस पर नायक ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि नियमों के तहत ही सब कुछ होना है, तो फिर समिति में सामान्य वर्ग का सदस्य भी अनिवार्य रूप से होना चाहिए, जिससे संतुलन बना रहे।
